चन्द्र सिंह भंडारी जिन्हें हम चन्द्र सिंह गढ़वाली के नाम से ही याद रखें, का जन्म पौड़ी गढ़वाल के चौथान पट्टी में  रौणीसेरा के मासी गाँव में 25 दिसंबर 1891में हुआ था. कृषक पिता की तरह बालक चन्द्र भी अनपढ़ थे पर इन्होने बिना किसी औपचारिक शिक्षा के भी पढ़ना लिखना सीखा.प्रथम विश्व युद्ध के समय 1914 में युवक चन्द्र लैंसडाउन जाकर फौज में भर्ती हो गए और अगले ही साल इनकी बटालियन को फ़्रांस के मोर्चे पर भेज दिया गया.वापस लैंसडाउन आने के अगले साल फिर मेसोपोटामिया और बगदाद की लड़ाई में चले गए.विश्वयुद्ध के बाद जब फौजियों की छटनी हो रही थी तो इनकी बहादुरी को देखते हुए इन्हें नहीं छेड़ा गया और कुछ दिनों का अवकाश मिला जिस दौरान इनकी मुलाक़ात गाँधी जी से भी हुई.बाद में इनकी बटालियन रायल गढ़वाल को अफगानिस्तान से लगी सीमा पर भेज दिया गया.इसी बीच आर्य समाजियों से इनका सम्पर्क हुआ और ये उनके   जागरूकता अभियानों और रुढियों पर प्रहार के अभियानों से काफी प्रभावित होने लगे.इसी दौरान वह समय आया जो किसी भी सैनिक के जीवन में अनोखा कहा जायेगा.

सीमान्त प्रांत में खान अब्दुल गफ्फार खान के नेतृत्व में पख्तूनों का ब्रिटिश राज के विरुद्ध शांतिपूर्ण असहयोग आन्दोलन चल रहा था जिसके खिलाफ अंग्रेज अफसरों ने गढ़वालियों की बटालियन को मुस्तैद किया क्योंकि भाषाई और सामाजिक, सांस्कृतिक विभिन्नताओं के चलते इस यूनिट के बहादुर जवानों से अंग्रेजों को उस मोर्चे पर बहुत आशायें थीं. 1930 में इनकी बटालियन रायल गढ़वाल रायफल्स पेशावर में तैनात थी,अंग्रेज अफसर फूट डालो और राज करो की नीति के तहत बटालियन को ब्रीफ कर चुके थे की पेशावर में मात्र 2 प्रतिशत हिन्दू हैं और 94 प्रतिशत मुसलमान,बाकी सिख .समझाया जा रहा था की मुसलमान किस तरह अल्पसंख्यक हिन्दुओं पर जुल्म करते हैं इस नाते मौका मिलने पर उन्हें छोड़ना नहीं है.अफसरों की इस तरह की बातों को चन्द्र सिंह गढ़वाली कायदे से, उदात्त हृदय के साथ समझ रहे थे और अपने अफसरों की मंशा से अपनी बटालियन को भी परिचित कराते रहते थे. उस समय सिपाहियों को रोमन लिपि में हिंदी पढ़ाई जाती थी ताकि फौज के काम कर सकें लेकिन हिंदी या अंग्रेजी के अखबार न पढ़ सकें लेकिन चन्द्र सिंह अब तक स्वाध्याय से पढ़ना लिखना सीख चुके थे.वो कैम्प से  निकल कर शहर में जाते,लोगों से घुलते मिलते और माहौल की जानकारी रखते थे. अखबार भी लेकर आते थे जिसे छिप कर पढ़ते और फिर पानी में डाल कर गला दिया करते थे. राहुल संकृत्यायन ने विस्तार से उनकी जीवनी लिखी है,साथ ही पेशावर की बागी गढ़वाल बटालियन का मुकदमा लड़ने वाले बैरिस्टर मुकुन्दी लाल ने भी बाद में एक लेख लिखा था इस केस के बारे में.

पेशावर काण्ड को अंगेजों ने दबाने की कोशिश की थी क्योंकि 1857 से 1930 तक स्थितियां काफी बदल चुकी थीं और इसका असर पूरे देश के सैनिकों पर पड़ता. इतिहासकारों ने भी अंग्रेजों का ही साथ दिया ताकि दुनिया को  इस काण्ड की महत्ता न पता चले.दिखाया यह जाता है की सैनिकों का यह क्षणिक आवेश था,जबकि वास्तविकता इससे अलग थी. अंग्रेज अपना काम कर रहे थे तो चन्द्र सिंह की बटालियन दूसरे मोर्चे के लिए कमर कस चुकी थी,जिसकी परिणाम काल कोठरी ही है,यह भी सभी साथियों को पता था.अंग्रेज अफसर समझा चुके थे की मुसलमानों को गोली मार देने में कोई खराबी नहीं है जबकि चन्द्र सिंह गढ़वाली ने अपनी यूनिट को पूरी तरहतैयार कर दिया था की निहत्थे,अहिंसक देशवासियों पर गोली चलाने की जगह खुद को गोली मार लेना अधिक सही रहेगा, उनपर गोली किसी हालत में नहीं चलेगी.कुछ मुखबिरी हुई,अंग्रेजों को गड़बड़ी का अंदेशा था लेकिन इस पैमाने पर नहीं की सभी सैनिक एक सुर हो जायेंगे. 23 अप्रैल 1930 को पेशावर के किस्साखानी बाज़ार में हजारों लाल कुर्ती वाले खुदाई खिदमतगारों की बड़ी सभा हो रही थी.बिना बल प्रयोग के ये तितर बितर नहीं किये जा सकते थे.
गढ़वाल रायफल के साथ कैप्टन रिकेट वहाँ पहुँचा और उसने फायर का आदेश दे दिया जिसके तुरंत बाद चन्द्र सिंह गढ़वाली की आवाज़ गूँजी ‘गढ़वाली सीज़ फायर’. बटालियन के सभी साथियों ने बन्दूक की नली जमीन से लगा दी,अफसर हक्का बक्का हो गया लेकिन फिर चन्द्र सिंह की आवाज़ हवा में गूँजी की हम किसी भी सूरत में फायरनहीं करेंगे भले ही हम सबको गोली मार दी जाय.हालाँकि बाद में अंग्रेज सिपाही आ गए और उन्होंने गोलियां चलायीं लेकिन स्वतंत्रता संग्राम की यह बहुत बड़ी घटना थी जिससे दिल्ली से लगायत लन्दन तक को गहरा सन्देश गया.आप स्वयं एक पल को उस समय की स्थिति का अंदाज़ा लगाइये.ब्रिटिश सिविल अधिकारी जॉन्सन ने लिखा है की रॉयल गढ़वाल रायफल विश्वयुद्ध (प्रथम) में ब्रिटिश इण्डिया की फौज की सबसे बहादुर बटालियन थी और उसके इस रवैये से लन्दन को बहुत बड़ा झटका लगा.अंग्रेजों ने तो इसे दबाने की पुरजोर कोशिश की ही लेकिन भारतीय नायकों ने भी इसे कोई वजन नहीं दिया और महात्मा गाँधी ने तो इसे साफ़ तौर पर ऐसी बगावत कहा था जो माफ़ी के लायक नहीं थी. अंग्रेजों ने भी वीर चन्द्रसिंह गढ़वाली और उनकी बटालियन पर 23 अप्रैल की नाफ़रमानी के लिए मुकदमा नहीं किया था वरन पूरी बटालियन को वापस बैरक में भेज दिया गया और अगले दिन फिर निकलने का हुक्म दिया गया.अगले दिन 24अप्रैल 1930 को इन बहादुर सेनानियों ने पेशावर की गलियों में उतरने से इनकार कर दिया. इन लोगों ने एक पत्र लिखा की पेशावर में निहत्थे पठानों का दमन करने की जगह ये सभी लोग फौज की नौकरी से इस्तीफ़ा दे रहे हैं और 24 घंटे से पहले इस्तीफ़ा मंजूर हो.परिणाम यह हुआ की बटालियन के उन फौजियों पर देशद्रोह का मुकदमा  दर्ज हो गया जिन्होंने इस इस्तीफे पर दस्तखत किये थे.इस्तीफे का कागज कमांडिंग अफसर के यहाँ तक पहुँचने के पहले ही जब्त हो गया. यहाँ यह ध्यान रहे की 1857 के सैनिक विद्रोह का तात्कालिक कारण विशुद्ध धार्मिक था जबकि पेशावर काण्ड पूर्णतया देशभक्ति की भावना से भरा हुआ था.यहाँ यह लिखने का अर्थ मंगल पाण्डेय और उनके सहयोगियों को कमतर आंकना नहीं वरन पेशावर की महत्ता को भुला दिए जाने की तरफ ध्यान दिलाना है.

कुछ लोग सरकारी गवाह बन गए और बाकियों का एबटाबाद में कोर्ट मार्शल हुआ.तत्कालीन प्रतिष्ठित अखबार लीडर ने खबर लगाई की 1857 के बाद पहले सिपाही विद्रोह का कोर्टमार्शल एबटाबाद में हो रहा है. दुःख की बात यह है की अहिंसा का जाप करने वाले नायक अंग्रेजों के साथ खड़े थे.कटु सत्य है की गाँधी जी ने पेशावर काण्ड के बारे में पूछे जाने पर फ़्रांसिसी पत्रकार पैट्रिश से कहा था की ‘जो सिपाही गोली चलाने के हुक्म को नहीं मानता है वह अपराध करता है, अपनी प्रतिज्ञा भंग करता है.हमारे हाथ में सत्ता आने पर हमें इन्हीं सिपाहियों से काम लेना होगा.अगर मैं उनकी नाफ़रमानी का पक्ष लेता हूँ तो डर रहेगा की वो मेरे राज में भी ऐसा ही करेंगे.’ सीधा मतलब यह हुआ की अपने गाँव-समाज के काफी दूर,एकदम अपरिचित और भिन्न लोगों को भी अपना मानते हुए जिन गढ़वाली सैनिकों ने अपना जीवन दाँव पर लगा दिया उनकी अहमियत गाँधी जी के लिए एक सामान्य अपराधी से अधिक नहीं थी.यह अलग बात है की अपने सत्य के साथ नियमित प्रयोग करने वाले बापू ने काफी बाद में भूलसुधार करते हुए कहा था की यदि उनके पास एक और चन्द्र सिंह गढ़वाली रहता तो देश पहले ही आजाद हो जाता.यह अलग बात है की तब तक गढ़वाली ग्यारह साल से अधिक की कैद काट कर रिहा हो चुके थे.इस दौरान उनको एबटाबाद,डेरा इस्माइल खान,अल्मोड़ा,बरेली,लखनऊ तथा देहरादून की जेलों में घुमाया जाता रहा ताकि कहीं वो अपनी विचारधारा से लोगों को प्रभावित न करने पायें.जेल यात्रा में ही नेता जी सुभाष चन्द्र बोस समेत अनेक लोगों से इनका मिलना हुआ.गढ़वालियों का मुकदमा लड़ने वाले बैरिस्टर मुकुन्दी लाल के अनुसार आज़ाद हिन्द फौज का बीज भी पेशावर काण्ड से ही अंकुरित हुआ,जब एहसास होने लगा की अंग्रेजों से ही प्रशिक्षित फौजियों को ही खड़ा किया जाय.कोई अचरज की बात नहीं की आज़ाद हिन्द फौज में भी गढ़वालियों की संख्या अच्छी खासी थी.

जेल यात्राओं में ही वीर चन्द्र सिंह का संपर्क वामपंथी रुझान वाले नेताओं से हुआ और ये उस चिंतन से प्रभावित होने लगे,हालाँकि 1941 में सशर्त रिहाई के बाद इलाहाबाद और वर्धा में भी इन्होने प्रवास किया तब तक पुनःअसहयोग आन्दोलन में भागीदारी के चलते तीन साल की कैद हो गयी.इनकी रिहाई में शर्त थी की ये गढ़वाल में प्रवेश नहीं कर सकते. पेशावर काण्ड के वकील बैरिस्टर मुकुन्दी लाल ने समय से पहले रिहाई और अधिकांश फौजियों की कम सजा के बारे में लिखा है की ‘मेरी बहस,दलील और वकीली चाल का कोई असर नहीं होता लेकिन अंग्रेज अफसर खुद नहीं चाहते थे की इस विद्रोह की खबर दुनिया को लगे, किसी को पता न चले की सेना अंग्रेजों के खिलाफ हो गयी है. मेरी दलील के आधार पर केवल चन्द्र सिंह को उमर कैद और बाकियों को आठ से दस साल तक की कैद सुनाई गयी थी लेकिन सब सजा पूरी होने के पहले ही छोड़ दिए गए थे.पेशावर काण्ड से अंग्रेज समझ  गए थे की भारतीय फौजी अब अपनों के खिलाफ, अंग्रेजों की तरफ से नहीं लड़ सकते.किसी फौजी ने माफ़ी नहीं मांगी थी,हमारे सभी मुवक्किलों ने बस एक ही बात कही थी उनका कोई कसूर नहीं’. राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं की ‘महात्मा गाँधी के नेतृत्व में जो महान आन्दोलन छिड़ा,केवल उसके नेताओं को ही महान बनाने की कोशिश हो रही है, मालूम हो की देश की आज़ादी का श्रेय केवल उन्हीं को है.खुदीराम बोस,भगत सिंह और आज़ाद की कुर्बानियों पर पर्दा डालने की कोशिश हो रही है लेकिन इतिहास उन्हें भुला नहीं सकता,यह निश्चित है.चन्द्र सिंह के रूप में हमारे देश को अद्भुत जन नायक मिला, अफ़सोस की देश की परिस्थितियों ने उसे अपनी शक्तियों के विकास और उपयोग का अवसर नहीं दिया.’
आज़ादी के लड़ाई के साथ ही टिहरीगढ़वाल में राजशाही के खिलाफ प्रजा का विद्रोह शुरू था.इस बीच चन्द्र सिंह गढ़वाली बम्बई में कम्युनिस्ट पार्टी की विधिवत सदस्यता ले चुके थे. वापस गढ़वाल आकर ये जनता के मुद्दों पर सड़कों पर पूरे जोश के साथ उतरने लगे थे और इनका व्यापक असर भी हो रहा था.राजशाही के खिलाफ संघर्ष में कामरेड नागेन्द्र सकलानी और मोलू भरदारी की शहादत हुई, दोनों शवों को लेकर जनता ने चन्द्र सिंह के नेतृत्व में टिहरी मार्च किया. राहुल सांकृत्यायन लिखते हैं की कांग्रेसियों की भरपूर कोशिश रहती थी की चन्द्र सिंह को जनता से दूर रखा जाय,इसके लिए तमाम उपाय अपनाए जाते थे.देश आज़ाद हो चुका था और कांग्रेसियों की नजर में वीरचन्द्र सिंह गढ़वाली ‘भोंपू लेकर घूमने वाला पागल सैनिक’ ठहराए जा चुके थे. 1948 में संयुक्त प्रान्त की पंडित गोविन्द वल्लभ पन्त की सरकार ने इस परम वीर को गिरफ्तार कर लिया जिसका मुख्य कारण यही था की  वामपंथी रुझान के चलते ये कांग्रेस की योजना में फिट नहीं बैठते थे.आज असहिष्णुता बहुत बड़ा मुद्दा है जिसपर कांग्रेसी और वामपंथी एक साथ हैं लेकिन कमाल देखिये की आज़ादी के तुरंत बाद वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली जब  गिरफ्तार होते हैं तब तमाम आरोपों में से एक यह भी था की ये ‘पेशावर के बागी’ थे जिनको सजा पूरी होने से पहले ही रिहाई मिल गयी थी.हालाँकि जब भारत से लगायत लन्दन के अखबारों में भी चन्द्र सिंह की गिरफ्तारी और उसमें पेशावर काण्ड के जिक्र की खबर छपी तो पंत ने माफ़ी मांगी और कहा गया की नोटिस में पेशावर का जिक्र भूलवश हो गया.

वीर चंद्र सिंह गढ़वाली के परिजन 

लगातार जेल की यातनाओं से गढ़वाली जी का स्वास्थ्य भी ठीक नहीं रहता था फिर भी नीतिगत मुद्दों पर संघर्ष इन्होने छोड़ा नहीं था,पेशावर काण्ड के फौजियों की माली हालत भी खराब हो चुकी थी और जब उनकी पेंशन औरपेशावर कांड की बरसी को राष्ट्रीय पर्व घोषित किये जाने की मांग के संबंध में ये देश के प्रथम प्रधानमंत्री से मिलने गए तो पंडित नेहरु ने कहा -‘पेंशन ?तुम तो बागी हो’.वापस आकर चुनाव लड़कर हक लेने की सोचे तो जनता ने नकार दिया.वृद्धावस्था में कोटद्वार में कांग्रेस नेता नारायण दत्त तिवारी की सभा में जब ये अपना भोंपू लेकर जनता के वास्तविक मुद्दों की बात करने लगे तो आज़ाद भारत में, अपने ही घर में,बुढ़ापे में अपने ही लोगोंकी लाठियों का शिकार हो गए.वृद्ध शरीर को इतनी चोटें पहुँची की फिर कभी बिस्तर से उठ नहीं सके और 1979में अनगिनत पीड़ा लिए हुए इस दुनिया को छोड़ गए.राजनीति का दोगलापन देखिये की बुढ़ापे में जब नारायण दत्ततिवारी उत्तराखंड के मुख्यमंत्री बने तो उन्होंने वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली पर्यटन योजना शुरू की.हाँ 1994 में इनके ऊपर भारत सरकार ने डाक टिकट जरूर जारी किया लेकिन टिकटों से ही कौन याद रखता है,टिकट पर छपे केवल एक दो चेहरे ही देश को याद हैं.संभवतः जिन लोगों ने इस लेख को पूरा पढ़ लिया वो जरूर कुछ दिन उस वीर कोयाद रखेंगे जिसकी मिशाल मिलनी मुश्किल है,जिसे दिल्ली में तो नहीं लेकिन पेशावर में जरूर कुछ लोग याद रखे  हुए होंगे.1975 यानी वृद्धावस्था में उत्तरप्रदेश के तत्कालीन मुख्यमंत्री हेमवती नंदन बहुगुणा ने वीर चन्द्र सिंह गढ़वाली को कोटद्वार के तराई इलाके के वन क्षेत्र हल्दूखाता में दस एकड़ जमीन नब्बे साल के लिए लीज पर देने की घोषणा की थी.ये जमीन आजतक उन्ही के नाम दर्ज है जबकि उनकी मृत्यु (1979) के बाद लीज अपने नाम ट्रांसफर कराने के लिए उनके पुत्र आनंद सिंह और खुशाल सिंह वन विभाग की दौड़ लगाते लगाते दुनिया छोड़ गए.30 अगस्त 2018 में बहुओं को अतिक्रमणकारी मानते हुए उत्तरप्रदेश वन विभाग से नोटिस मिल चुका है.अखबारी रपटों के मुताबिक वीर गढ़वाली के परिजनों ने इस तरह अपमानित किये जाने से आहत होकर भारत के प्रधानमंत्री से मांग की है की ‘जब हमारे देश में ही हमें इस तरह से लज्जित किया जा रहा है तो इससे अच्छा की हमें पाकिस्तान भेज दिया जाय’.