अगर देखा जाय तो कश्मीर से लेकर कन्याकुमारी तक सर्वाधिक उपासनास्थल शिव के  ही मिलते हैं जिनमें अनेक स्थल ऐसे हैं जहाँ प्रतिदिन लोगों की भीड़ लगी  रहती है तो वहीं कुछ स्थल ऐसे हैं जो अपनी स्थानीय पहचान में ही सिमट कर रह  गए हैं।बदलते समय के साथ अब लोग उन जगहों पर जाने लगे हैं जिनका अपनी  विशिष्टताओं के चलते अलग पहचान है।प्रश्न यह उठता है कि भारत सरकार और  राज्य सरकारों के अपने पर्यटन मंत्रालय/विभाग होने,लंबे-चौड़े बजट के  प्रावधानों के बाद भी अभी तक अपने देश की ही तमाम धरोहरों से हमें अनजान  क्यों रखा गया है।अपने ही देश की इन सांस्कृतिक और धार्मिक विरासतों के  बारे में हमें पता ही नहीं और दुनिया भर की जानकारियाँ हमारे पास हैं।ऐसी  ही एक विशिष्ट धरोहर है त्रिपुरा में उनकोटि।

उनकोटि का अर्थ है कोटि या करोड़ से एक कम,त्रिपुरा में इसी नाम से एक जिला  है।राजधानी अगरतला से 178 किलोमीटर दूर इस जिले के कैलाशहर सबडिवीजन में कम  से कम सातवीं-नौवीं सदी का एक शैव तीर्थ अपने आप में अनोखा है,जनश्रुति है  कि यहाँ पहाड़ियों में एक करोड़ से एक कम मूर्तियाँ उकेरी गई हैं।पहाड़ में  ही उकेरी गयीं मूर्तियों के अलावा यहाँ का प्राकृतिक परिदृश्य भी काफी मोहक  है जिसमें हरीभरी पहाड़ियों के अलावा अनेक झरने भी किसी को ठहर जाने के लिए  बाध्य कर देते हैं।यहाँ पहाड़ पर तराश गए लगभग चालीस फ़ीट ऊँचे शिव हैं  जिन्हें उनकोटिश्वर काल भैरव कहा  जाता है,यह शिव के मस्तक की नक्काशी  है।दुर्गा एवं अन्य देवियाँ हैं तो वहीं गणेश जी की भी कई मूर्तियां उकेरी  गयी हैं।यह शिल्प परम्परागत मूर्ति कला से अलग,दुनिया भर की प्राचीन, आदिम  शिल्प से मिलता जुलता है या कहें कि बहुत हद तक एजेटिक शिल्प के नजदीक लगता  है।पहाड़ पर ही नक्काशी के अतिरिक्त तमाम मूर्तियां पत्थरों को गढ़ कर भी  बनायी गयी हैं।प्राकृतिक कुंड भी मनमोहक हैं जिनमें सीता कुंड और  ब्रह्मकुंड की स्थानीय धार्मिक महत्ता भी है,इन कुंडों में झरनों से लगातार  जल आता रहता है।

इस इलाके में प्रवेश करते ही लगता है कि आप किसी दूसरी दुनिया में प्रवेश  कर गए हैं क्योंकि समूची खुली पहाड़ियों पर इस तरह की विशाल मूर्तियां किसी  को भी भौचक्का करने के लिये काफी हैं।अपने आप में यह पत्थरों पर उकेरा गया  अनोखा संसार है।जैसा की हम देखते हैं पूर्वोत्तर भारत अभी तक देश की  पाठ्यपुस्तकों एवं आम जनमानस से अधिकाँश कटा ही रहा है,शायद अंग्रेज या  मुग़ल यहाँ तक पहुँच नहीं सके या शेष भारत के विद्वानों को भी इस इलाके के  अध्ययन में रूचि नहीं थी तो उनकोटि के इतिहास के बारे में भी कोई प्रामाणिक  तथ्य उपलब्ध है नहीं।इस मुक्त आकाश देव स्थान के बारे में केवल  स्थानीय लोक कथाएं ही हैं।एक कथा है कि भगवान शिव कैलाश से काशी की यात्रा  में इस स्थान पर रात्रि विश्राम के लिए रुके थे तो अगले दिन, प्रातः देर से  उठने पर सबको पत्थर का बना दिया।किंतु इस कथा के आधार पर तो स्वयं शिव की  मूर्ति यहाँ होनी नहीं चाहिए थी।

दूसरी कथा है कि कल्लू नाम का कुम्हार शिव का परम भक्त था,उसने भगवान शिव  एवं माता पार्वती के साथ ही कैलाश पर्वत पर स्थान पाने के लिए तपस्या  की।भगवान ने उसके सामने शर्त रख दी की यदि वह एक रात में करोड़ मूर्तियां  बना देगा तो उसकी प्रार्थना स्वीकार होगी परन्तु कल्लू रात भर में एक करोड़  से एक कम ही मूर्तियां बना पाया। यह तो हुई कथाओं की बात परन्तु हम अभी तक  उन लोगों के बारे में अनजान हैं जिनके हाथों से शिव संसार उनकोटि में गढ़ा  गया है।दुनिया भर के पर्यटन स्थलों की तस्वीरें लगाने वाले लोगों और देश भर  में धार्मिक पर्यटन पर निकलने वाले श्रद्धालुओं का एक बहुत मामूली हिस्सा भी अगर उनकोटि की ओर भी आये तो निश्चित ही उसे एक नया एहसास होगा।

कैलाशहर और धर्मनगर के बीच उनकोटि कोई दुर्गम स्थान भी नहीं है,कैलाशहर से  मात्र आठ किलोमीटर की दूरी है।कैलाशहर बाहरी पर्यटकों के लिए रुकने लायक  जगह है,नजदीकी रेलवे स्टेशन धर्मनगर मात्र बीस किलोमीटर दूर है और अगरतला  से धर्मनगर की ट्रेन का समय भी सुविधाजनक है।अगर भीड़भाड़ से कहीं  दूर,प्राकृतिक सौंदर्य के बीच कुछ समय बिताना हो तो त्रिपुर सुंदरी देवी को  पूजने वाले त्रिपुरा के इस इलाके में आना एक सुखद अनुभव हो सकता है।यहाँ  माघ में मेला भी लगता है और सबसे बड़ा उत्सव चैत्र में अशोकाष्टमी का मेला  है जिसे स्थानीय लोग भगवान राम की रावण पर विजय के रूप में मनाते हैं।  पुरातत्व विभाग अब इस क्षेत्र की देखभाल करता है और चर्चा है कि भारत सरकार  ने इसे वर्ल्ड हेरिटेज साइट में की सूची में शामिल करने के लिए यूनेस्को  को पत्र लिखा है।