विविधताओं से भरे हुए भारत में अभी भी अनेक धार्मिक एवं पुरातत्व महत्व के स्थल ऐसे हैं जिनके बारे में बाहर की दुनिया को कम पता है,यहाँ बाहर से अर्थ देश से बाहर नहीं वरन उस स्थान,जिले या प्रदेश से बाहर,अपने ही देश से है.यहाँ तक की इस इंटरनेट युग में भी हम अपनी ही अधिकांश धरोहरों से अपरिचित हैं.ऐसा ही एक महत्वपूर्ण स्थल है असम के ग्वालपाड़ा जिले में स्थित सूर्य पहाड़.ग्वालपाड़ा के बारे में चीनी यात्री ह्वेनसांग के संस्मरणों के आधार पर कहा जाता है की यह कुमार भाष्कर वर्मन के प्राग्ज्योतिष राज्य की राजधानी रही होगी.कम से कम सूर्य पहाड़ और इसके अगल बगल की खुदाइयों के आधार पर यह तो माना जा सकता ही है की कभी यह स्थली काफी समृद्ध और गहमागहमी वाली रही होगी.सूर्य पहाड़ ग्वालपाड़ा जिला मुख्यालय से बारह किलोमीटर दूर है और असम की राजधानी से 132 किलोमीटर दूर स्थित है जहाँ से ब्रह्मपुत्र दिखती है.

जैसा की नाम से स्पष्ट है की इस पहाड़ी का सूर्य देव से संबंध है तो है ही लेकिन यहाँ अनेकों शिवलिंग भी मिले हैं.इन अनगिनत शिवलिंगों के बारे में अनेक लोककथाएं हैं जिनमें प्रमुख है की वेदव्यास यहाँ दूसरी काशी का निर्माण करने की ठान लिए थे.ये तो हुई कथा की बात किन्तु इस जगह पर पुरातत्व विभाग की खुदाई के बाद हिन्दू के अतिरिक्त जैन एवं बौद्ध धर्म की भी उपस्थिति के प्रभावी प्रमाण मिलते हैं. इस स्थान पर अधिकांश स्थानीय लोग पर्यटन के ही नजरिये से आते हैं परन्तु माघ के महीने में यहाँ बड़ा मेला लगता है.

1993 में यहाँ पहली बार पुरातत्व विभाग ने खुदाई शुरू की थी जिसमें एक बड़ी गोल आकृति मिली जिसमें बीच में गणेश और चारो तरफ सूर्य की बारह मूर्तियाँ उकेरी गयी हैं.एक सुव्यवस्थित तालाब भी मिला है जिसके चारों तरफ पत्थरों की व्यवस्थित चिनाई की गयी है .पहाड़ियों पर तमाम शिवलिंग के साथ ही कुछ बौद्ध स्तूप मिले हैं तो वहीँ बौद्ध विहारों के भी अनेक अवशेष मिलते हैं.जैन तीर्थंकरों की मूर्तियाँ मिलना भी अपने आप में काफी आश्चर्यजनक है क्योंकि असम या पूरे पूर्वोत्तर भारत में जैन धर्मावलम्बियों की उपस्थिति आधुनिक काल की मानी जाती रही है जो व्यवसाय की दृष्टि से उधर गए.इन्ही व्यवसायियों में से कुछ लोगों ने इस स्थान के पास अब तीर्थंकरों की संगमरमर प्रतिमाएं लगा कर एक अलग परिसर बना दिया है जो निश्चित ही एक पुरातात्विक महत्व की स्थली के साथ न्याय नहीं करता परन्तु उन श्रद्धालुओं ने अपने तरीके से इस स्थान को सम्मान दिया है,इस बात से इंकार भी नहीं किया जा सकता.

हिन्दू,जैन एवं बौद्ध,तीनों धर्मों की उपस्थिति के अनगिनत प्रमाण मिलने से यह तो स्पष्ट है की यह कभी महत्वपूर्ण स्थल रहा होगा किन्तु अपनी धरोहरों के प्रति हमारी लापरवाही के चलते इस स्थान के बारे में उतना अध्ययन नहीं हुआ जो होना चाहिए था.वैसे भी आप देखें तो पूर्वोत्तर भारत देश की मुख्यधारा से पता नहीं क्यों दूर ही रखा गया है,उसमें असम फिर भी चर्चा में आता रहता है फिर भी सूर्यपहाड़ जैसी धरोहरों के बारे में तो हमें जानना ही चाहिए.