कलश एक ऐसी जनजाति है जिनके देवता इंद्र एवं यम हैं साथ ही वो खुद को सिकंदर महान का वंशज मानते हैं,पाकिस्तान जैसे  इस्लामिक देश में जिन्हें कानूनन परम्परागत रूप से वाइन निकालने एवं सार्वजनिक रूप से पीने की छूट मिली हुई है लेकिन अब समय एवं परिस्थितियों के चलते इनके सामने अस्तित्व का संकट आ खड़ा हुआ है।    

अफगानिस्तान-पाकिस्तान बॉर्डर पर, हिन्दुकुश की खूबसूरत घाटी में पाकिस्तान के उत्तरी सीमान्त खैबर पख्तूनख्व (केपी) सूबे के चित्राल जिले में दुनिया की एक अनोखी विकसित जनजाति 'कलश' रहती है जो आज तक अपनी परम्पराओं को यथावत बचाए हुए है तथा स्थानीय लोगों से रंग-ढंग एवं परम्पराओं के मामले में एकदम भिन्न है।

कभी कलश आबादी का विस्तार अफगानिस्तान के नूरिस्तान से लगायत कश्मीर घाटी के नजदीक तक था जिसे लोग अलौकिक शक्तियों से परिपूर्ण परियों वाला देश परीस्तान कहते थे जो बाद में काफिरस्तान बोला जाने लगा। एक समय ऐसा था की इस इलाके में कलशों का शासन भी था,गांधार के शासक कनिष्क और कुषाणों के राज के बाद इस घाटी में कलश शासन ही था परन्तु वर्तमान में इनकी आबादी  मात्र तीन गाँवों तक सिमट चुकी है। दुनिया भर के लोगों का आकर्षण यह घाटी हिंसाग्रस्त इलाकों के नजदीक होने के नाते पर्यटकों के लिए बहुत सुगम नहीं है परन्तु यदा कदा अन्तर्राष्ट्रीय विशेषज्ञ एवं पर्यटक वहां तक पहुँचने लगे हैं और बाहर की दुनिया को विशिष्ट ऐतिहासिक धरोहरों को संजोये कलश लोगों से परिचित करा रहे हैं। प्रकृति एवं अनेक देवताओं के उपासक कलश को इंडोआर्यन नस्ल का माना जाता है हालाँकि, इनके मूल स्थान एवं चित्राल घाटी में आगमन को लेकर तमाम मत भिन्नता है।

योरोपियन एवं अमेरिकन डीएनए सैंपलिंग में भी कलश की विशिष्टता साबित हुई है। इनकी जड़ यूरेशियन नस्ल की और दस हजार साल पहले की बतायी जा रही है। इन्हें जेनेटिक आइसोलेट भी कहा जाता है यानि इनकी मूल नस्ल में अन्य नस्लों का संसर्ग नहीं है। अपने रहन-सहन एवं परम्पराओं के आधार पर इन्हें ग्रीस के सिकंदर महान का वंशज माना जाता है, साथ ही इनका पहनावा भी प्राचीन ग्रीक लोगों की तरह है। इनकी लोक कथाओं में इनका आदि पुरुष सलाकश (सेल्युकश) है जो सिकंदर का सेनापति था और भारत के इस इलाके से उसका संबंध योरोपियन एवं भारतीय साक्ष्यों से भी साबित होता है। ग्रीक साक्ष्यों के अनुसार चन्द्रगुप्त मौर्य से परास्त होने के बाद सेल्युकश ने वैवाहिक संधि कर ली थी और भविष्य पुराण के प्रतिसर्ग पर्व में भी वर्णन है की चन्द्रगुप्त मौर्य ने यवन कुमारी से विवाह किया था।

चौदहवीं सदी के शुरू में अफगानिस्तान वाले इलाके में काफी बड़े पैमाने पर लोगों का धर्मांतरण करके उन्हें मुलसमान बना दिया गया था और जो बचे हुए थे उनके लिए उन्नीसवीं सदी के अंत में अब्दुर्रहमान खान ने एक सैन्य अभियान चला कर  इस्लाम कबूल करने को विवश कर दिया। जिन्हें यह स्वीकार नहीं था वो मारे गए। इस प्रकार कलश केवल चित्राल के तीन गाँवों तक सिमट गए क्योंकि वर्तमान में जो बचे हुए लोग हैं उधर तक आक्रान्ता पहुँच नहीं सके थे। काफी समृद्ध सांस्कृतिक विरासत वाली यह प्रजाति फिलहाल पाँच हजार के आसपास की जनसंख्या तक सिमट कर रह गयी है जबकि 1969 में चित्राल स्टेट के पाकिस्तान में विलय के बाद सरकार ने विशेष जनजाति क्षेत्र का दर्ज़ा देकर इस धरोहर को बचाने की कोशिश जरूर की। हाँ तालिबानों के उदय के साथ ही इस संवेदनशील प्रजाति पर फिर संकट का साया मंडराने लगा और इन लोगों के बीच काम कर रहे कुछ योरोपियन लोगों की हत्याएं एवं अपहरण का दौर भी शुरू हुआ क्योंकि अगल बगल की इस्लामिक आबादी के बीच इन काफिरों की जीवन शैली तालिबानियों की मान्यताओं के एकदम विपरीत है; हालाँकि यूनेस्को एवं यूरोपियन यूनियन की कड़ी नज़र के चलते पाकिस्तानी हुकूमत ने इन्हें संरक्षित एवं सुरक्षित रखने की भी भरपूर कोशिश की है।

यह स्थिति उन लोगों की आज है जो खुद को महान योद्धा सिकंदर के वंशज मानते हैं। उनकी मान्यताओं पर मुहर लगाते हुए एलिस अल्बिनिया ने अपनी पुस्तक 'इम्पायर ऑफ़ द इंडस' में लिखा है कि तैमूर अपने तमाम अभियानों में केवल चित्राल के इलाके में ही पीछे हटने को विवश हुआ था। हिन्दुस्तान की तरफ कूच कर रहे बाबर को भी इस इलाके से बच कर निकलने की सलाह दी गयी थी, यहाँ तक की चंगेज खान ने भी इधर जाने की बजाय रास्ता बदल लिया था। हाँ, महमूद गजनवी के बारे में ऐसा नहीं कह सकते क्योंकि जेम्स बर्ड के अनुसार गजनवी ने इस इलाके के सबसे बड़े मंदिर को ध्वस्त कर दिया था और उन लोगों का सबसे पवित्र पत्थर उठा कर लेता गया था जिसपर तमाम मन्त्र लिखे हुए थे और जिसकी धार्मिक मान्यता बहुत थी।    

विशिष्ट दर्ज़ा प्राप्त जनजाति होने के नाते एक इस्लामिक देश में भी इन्हें परम्परागत रूप से अपनी वाइन निकालने एवं समारोहपूर्वक, सार्वजनिक रूप से पीने की छूट मिली हुई है। इनकी महिलाओं में पर्दा प्रथा एकदम नहीं है क्योंकि इनका पहनावा ग्रीक प्रभाव वाला ही है। खूबसूरत कढ़ाई वाला इनका चोंगा उतना ही आकर्षक होता है जितनी ये महिलायें स्वयं हैं। जी हाँ, कलश दुनिया के सबसे खूबसूरत लोगों में गिने जाते हैं। इनकी महिलायें तथा बच्चियां सर पर कढ़ाईदार टोपी पहनती हैं जो यूरेशियन महिलाओं की विशिष्टता है। चटख रंगों के कपड़े पहन कर रहने वाली महिलाओं पर किसी प्रकार की बंदिश नहीं है। हाँ, माहवारी के समय एक प्राचीन ग्रीक प्रथा का पालन करना अनिवार्य है। गाँव में रजस्वला महिलाओं के लिए एक विशेष कक्ष है जहाँ ऐसी महिलायें तथा किशोरियां उन दिनों में सामूहिक रूप से रहती हैं। महिलाओं को अपने लिए पति चुनने की आज़ादी है और उत्सवों के समय में खासकर युवक-युवतियां अपने लिए जीवन साथी चुन लेते है,साथ ही मनोनुकूल न होने पर छोड़ कर दूसरा का चयन कर लेना भी एक सहज प्रवृत्ति है ।

ऋतुपरिवर्तन एवं फसल चक्र पर आधारित त्यौहारों पर ग्रीक एवं हिन्दू संस्कृति का मिलाजुला असर दिखता है एवं इनकी कलश भाषा पर भी दोनों संस्कृतियों का असर है। चौमास इनका प्रमुख त्यौहार है जो इनके कैलेण्डर वर्ष के अंत में हफ्ते भर चलता है। किसी पर्व पर देवता को केवल दूध अर्पित किया जाता है तो किसी पर पशुओं की बलि होती है। उपासना स्थल पर बलि का स्थान भी महत्वपूर्ण होता है। इनमें इंडो-ग्रीक तो कहीं इंडो-इरानियन संस्कृति भी नजर आती है। इनके तमाम देवताओं में सुरा प्रेमी इंद्र हैं तो वहीँ वैदिक युग के यम एवं मार भी हैं। संतानोपत्ति एवं महावारी के समय महिलाओं की पूजनीय देवी निर्माली हैं तो हिन्दुकुश के सर्वोच्च शिखर पर वास करने वाली कुश्माई पशुधन एवं फसल की रक्षा करने वाली देवी हैं। परिवार की सुख शांति की रक्षक देवी जेष्टक हैं। कभी भी और किसी की भी प्रार्थना स्वीकार करके रक्षा करने वाले देवता का नाम महानदेवु है।

कलश लोकगाथाओं में कलश समाज के आदि पुरुष का स्थान त्साम (श्याम) नामक स्थान है, जहाँ से एक देवता चौमास के पर्व पर घोड़े का रूप धर कर आते हैं जो कभी कभी मनुष्य के सर और घोड़े के धड़ वाले रूप में बदल जाते हैं जो यह ग्रीक प्रभाव वाले देव हैं। जिस रूप में आज कलश धर्म बचा हुआ है उसे दुनिया का अनोखा धर्म माना जाता है जो उसी रूप में है जिस रूप में इस घाटी में आने वाले इनके पुरखे मानते थे,उपासना पद्धति एवं परम्पराएं भी वही हैं क्योंकि बचे हुए इन लोगों के ऊपर बाहरी प्रभाव नहीं हुआ । आज भी इनके घर एवं देवस्थान लकड़ी की खूबसूरत नक्काशियों वाले हैं एवं कढ़ाई-बुनाई की प्राचीन शैली की कला को ये लोग संजोये हुए हैं। मृत्यु इनके समाज में आज भी आनंद का उत्सव हैं क्योंकि इनकी मान्यताओं के अनुसार जड़-जीव सबमें एक पवित्र आत्मा का वास है और मृत्यु के बाद वह आत्मा परमात्मा में विलीन हो कर मोक्ष को प्राप्त कर लेती है इसलिए अंतिम संस्कार के समय धूमधाम से नृत्य एवं संगीत का कार्यक्रम आयोजित होता है।

ज्योतिष एवं ग्रह-नक्षत्रों की चाल पर पूरा विश्वास करने वाला कलश समुदाय इसलिए भी संकुचित होता जा रहा है क्योंकि अगल बगल के मुसलमान युवक यदि यहाँ की युवतियों से विवाह कर लेते हैं तो फिर वह युवती समाज से निष्कासित हो जाती है और उसकी घर वापसी की कोई गुंजाइश नहीं रहतीअपने खुले, निश्छल स्वभाव, व्यवहार के चलते युवतियां आसानी से बाहरी युवकों के झाँसे में फंस जाती हैं जिसके खिलाफ अब कुछ सामाजिक कार्यकर्ता लामबंद होने लगे हैं क्योंकि कलश केवल पाकिस्तान की ही नहीं बल्कि दुनिया की एक विशिष्ट धरोहर हैं जिन्हें सभ्यताओं के इतिहास के हित में बचा कर रखना जरूरी है। भले ही अपनी मान्यताओं के हिसाब से खुद को सिकंदर के वंशज मानने की इनकी बात सत्य न हो या स्थानीय अन्य निवासियों की नज़र में ये इस्लामिक मान्यताओं को एकदम से नकारने वाले काफिर ही क्यों न हैं लेकिन ये हैं एक नायाब प्रजाति के खूबसूरत, सरल एवं काफी मिलनसार इंसान।