कश्मीर का नाम लेते ही हमारे मन में तमाम तरह के ख्याल आते हैं,केसर और पश्मीना से पहले वहां जारी अशांति का माहौल तैरने लगता है.कश्मीरी पंडितों की बात भी जरूरी हो जाती है,साथ ही रोजमर्रा के जीवन में संगीनों के साए में गुजरते लोग एवं आतंकी हमले,पत्थरबाजी के साथ ही मन को विचलित कर देने वाली तस्वीरें. जन्नत की बातें तो किताबी ही लगती हैं क्योंकि रजाई में बैठ कर बर्फ की खूबसूरत तस्वीरें देखना अलग बात है और भारी बर्फ़बारी से पैदा दुश्वारियों से दो चार होना अलग. व्यवस्था में दीमक की तरह लग चुके प्रशासनिक भ्रष्टाचार की बातें वहां भी हैं ही लेकिन इन सब के बीच ही एक छोटा सा समुदाय पश्तो भाषी पठानों का भी है जो की आजतक अपनी संस्कृति को संजोये हुए हैं लेकिन समय के साथ साथ अब उनकी अलग पहचान पर भी संकट आ खड़ा हुआ है.

वैसे तो असम,बंगाल से लगायत मध्यप्रदेश और देश के तमाम हिस्सों में कुछ पठान आबादी है ही एवं कश्मीर में भी बहुतेरे लोगों को पठान मूल का ही माना जाता है परन्तु राजधानी श्रीनगर से लगभग बीस किलोमीटर की दूरी पर गंदरबल में गुटलीबाग़ गाँव के आसपास का इलाका कश्मीर में पश्तो भाषी पख्तूनों का मुख्य केंद्र है.यहाँ अफगानी युसुफज़यी कबीले के लोगों की अच्छी खासी आबादी है.इसके अलावा कुपवाड़ा और अनंतनाग के साथ ही श्रीनगर में भी कुछ लोग अफगानी मूल के पश्तो भाषी हैं.कश्मीर की प्राचीन शारदा लिपि भले ही पंडितों के पलायन के साथ अब लुप्त हो चुकी है लेकिन बहुत ही कम संख्या में उपस्थिति ये पठान अपनी पश्तो को बचा कर रखे हुए हैं. इसका कारण है की भले ही ये इस्लाम के अनुयायी हों लेकिन इनकी संस्कृति कश्मीर की मुसलमान आबादी वाली नहीं रही है.यहाँ तक की अभी भी इस समुदाय के गाँवों में आपसी मसले सुलझाने के लिए पारम्परिक सभा ‘जिरगा’ का ही सहारा लिया जाता है क्योंकि पुलिस और अदालत तक जाना अच्छा नहीं समझा जाता. अफगानिस्तान या पाकिस्तान के सीमान्त इलाकों में जिरगा के फैसलों को लेकर जैसी प्रतिक्रियायें मिलती हैं वैसी कश्मीरी पख्तूनों के साथ नहीं है.पेशावर या काबुल रेडियो के सहारे पश्तो संगीत से जुड़े रहे समुदाय को अब इंटरनेट से काफी लाभ मिला है और युवाओं के स्मार्टफोन में पश्तो गाने बजने लगे हैं.इस समुदाय में पश्तो में लिखी पुरानी किताबें घरों में संरक्षित रही हैं जिनसे नयी पीढ़ी को भी परिचित कराया जाता रहा है लेकिन इंटरनेट ने तमाम दुनिया की तरह इनके लिए भी दरवाज़े खोल दिए हैं.इनकी रिश्तेदारियां घाटी के तमाम लोगों की तरह पाकिस्तान कब्जे वाले इलाकों में रही हैं,साथ ही अपनी अफगानी मूल भूमि से भी जुड़ाव रहा है किन्तु अब वीसा सम्बन्धी दिक्कतों के चलते अवागमन बुरी तरह प्रभावित है जिसके चलते सोशल मीडिया जुड़े रहने का बड़ा साधन है. काफी लम्बी बंदिश के बाद अब इस समुदाय में भी लड़कियों की शिक्षा का प्रसार हो रहा है और स्थानीय स्कूलों में उनकी अच्छी खासी संख्या दिखती है.

ब्रिटिश इण्डिया में जब सरहदबंदी नहीं हुई थी,ढेरों पख्तून कश्मीर में और देश में थे लेकिन देश के बाकी हिस्सों में जहाँ छिटपुट बसे हुए हिन्दुस्तानी हो गए थे. छिटपुट फेरी वाले एवं कुछ व्यापारी भी थे लेकिन कश्मीर की स्थिति अलग थी वहां मुगलों और डोगरा राजाओं की सेना के लिए लाये गए पख्तूनों के अलावा अफगान शासन के दौरान
आये लोग भी थे तो वहीं बड़ी आबादी घुमंतू बंजारों के रूप में भी थी जिनके पास हिन्दुस्तान की कोई नागरिकता नहीं थी क्योंकि कश्मीर से लगायत खैबरपख्तूनख्वा होते हुए अफगानिस्तान तक उनका आना जाना लगा रहता था. विभाजन और भारत की आजादी की घोषणा होते ही सरहद बन गयी और कश्मीरी पख्तून समुदाय कहें तो अपनी मुख्यभूमि से एकदम कट गया जिनके पास कोई नागरिकता नहीं थी. स्वतंत्रता आन्दोलन में अपनी शांतिपूर्ण
जबरदस्त भागीदारी के चलते महान पख्तून नेता खान अब्दुल गफ्फार खान पूरे देश के प्रिय हो चुके थे,हालाँकि यह भी सच है की विभाजन के तरीके से उनको दुःख था और गाँधी जी हों या नेहरु जी,दोनों से उनकी निराशा झलकती है उनके इस बयान में जब उन्होंने दुखी मन से पाकिस्तान के साथ जाने पर कहा था की ‘हमें भेड़ियों के आगे डाल दिया गया’.उनकी दूरदर्शिता इस बात में झलकती है की आज भी पख्तूनों की आबादी वाला पाकिस्तानी सूबा ‘खैबर पख्तूनख्वा’ हिंसा की जबरदस्त चपेट में हैं, जहाँ पख्तूनों को दोयम दर्जे का ही समझा जाता है.

जुलाई 1954 में भारतीय कश्मीर के प्रधानमंत्री बख्सी गुलाम मोहम्मद ने गुटलीबाग़ में समारोहपूर्वक कश्मीर में निवास कर रहे लगभग एक लाख पश्तो भाषी अफगानियों को भारतीय नागरिकता का प्रमाणपत्र सौंपा.इस दौरान आज़ादी की लड़ाई में इस समुदाय के योगदान और बादशाह खान की तारीफ की गयी.पश्तो कबीलों के सरदारों ने भी अपनी कर्मभूमि के प्रति वफ़ादारी की शपथ ली.’कश्मीर के प्रधानमंत्री’ से कुछ ऐसे लोगों को अजीब लगा होगा जिनका इतिहास से वास्ता कम होगा,उनकी जानकारी के लिए बता दिया जाय की विलय के समय व्यवस्था यह थी की भारतीय कश्मीर के संवैधानिक मुखिया को वजीरे आज़म या प्रधानमंत्री कहा जाएगा और प्रथम प्रधानमंत्री बने थे मेहर चंद महाजन.मार्च 1965 में कश्मीर कश्मीर के संविधान में संशोधन के बाद मुख्यमंत्री का पद हुआ.तमाम बातें हैं देश की,इतिहास ही नहीं वरन वर्तमान से भी अपरिचित लोग फिलहाल बौद्धिक विमर्श में लगे हुए हैं.

भारतीय नागरिकता मिलने के अवसर पर पख्तूनों ने कश्मीर एवं भारत की खुशहाली में योगदान की कसमें खायीं और यह बात आज भी सच है की घाटी में अलगाववादी एवं आतंकी मानसिकता के विस्तार के बावजूद पख्तूनों की आबादी भारत की हितैषी ही बनी हुई है,इस समुदाय से पाकिस्तान परस्ती की एक्कादुक्का घटनाएँ ही सामने आती हैं क्योंकि इनकी मानसिकता भी अपने अफगान मूल वाली ही है जो अफगानिस्तान और पाकिस्तान के पख्तून
इलाकों में हिंसा के पीछे पाकिस्तान का ही हाथ मानती है.इसका एक कारण और भी है की घुमंतू पख्तूनों में बड़ा हिस्सा ऐसे लोगों का भी रहा है जो अपने मुल्क में जारी कबीलाई मारकाट से बचने के लिए ही शांत वादियों में डेरा डाल चुके थे.अफगानिस्तान की आज की स्थिति भी उनके सामने है ही जिससे वो शांतिपूर्ण ढंग से अपना जीवन बिताना ही उचित समझते हैं,हालांकि अलगावादियों का दबाव इनके समुदाय पर भी कम नहीं है.लेकिन इनकी हिफाजत और भरोसे के लिए ही गुटलीबाग़ में भारतीय सेना का कैम्प भी स्थापित है.

कश्मीरी पख्तून काफी मिलनसार और शांतिपूर्ण व्यवहार वाले हैं और काफी हद तक अपने में ही सिमटे हुए हैं,यहाँ तक की इनकी अपनी अलग मस्जिदें हैं और अपने धार्मिक नेता. अनेक घर ऐसे मिल जायेंगे जिनमें कम कम
महिलायें तो ऐसी मिलेंगी ही जिन्हें उर्दू या डोगरी की जगह केवल पश्तो ही बोलनी आती है.शिक्षा के प्रसार के साथ यह विशिष्टता समाप्त हो तो रही है किन्तु कश्मीरियत से अलग इनकी पख्तूनवाली संस्कृति बची हुई है,जो खानपान से लगायत पहनावे के आधार पर भी इन्हें आम कश्मीरी मुसलमान से अलग करती है. शायद यही कारण है की परम्परागत रूप से कश्मीरी मुसलमान भी इन्हें खुद से अलग ही मानते हैं.अब देखना यही है की समय के
साथ हर जगह हो रहे बदलावों के बीच ये लोग कब तक बचे रहेंगे,भारतीय सेना और कश्मीर पुलिस में भी ये अपना योगदान दे रहे हैं.तालिबानी शासन शुरू होते ही सूली पर चढ़ा दिए गए तत्कालीन अफगान राष्ट्रपति बारामुला के सेंट जोसफ स्कूल से पढ़े हुए थे,बदल चुके राजनैतिक हालातों के चलते अब तो ऐसा हो नहीं सकता. वहीं डोगरा राजा गुलाब सिंह ने अपनी फौज के लिए जिन अफगानों को रखा था उनके वंशजों की रिहाइश भी जम्मू और पुंछ के कुछ भागों में है लेकिन ये घाटी वालों से इसलिए अलग हैं की पश्तो के साथ ही इन लोगों ने डोगरी को भी अपनी बोली के रूप में अपना लिया था.
बाकी यदि हम कश्मीर के इतिहास की बात करें तो अफगानों ने कश्मीर पर कभी शासन भी किया था,भले ही कम समय के लिए था लेकिन वो कश्मीर के इतिहास का ऐसा काला धब्बा है जो मिटाया नहीं जा सकता.मुगल साम्राज्य की पकड़ कमजोर होते ही कुछ कश्मीरी व्यापारियों ने अफगानियों को आमंत्रित करने की गलती कर दी थी जिसकी बहुत बड़ी सजा मिली थी.निशाने पर पंडित और शिया तो खासकर थे ही लेकिन घाटी के संपन्न व्यापारियों को भी जमकर लूटा गया था.बमुश्किल सत्तर साल के अफगानी शासन में अहमद शाह अब्दाली और उसके बाद के शासकों ने घाटी को बर्बाद करने में कोई कसर नहीं छोड़ी थी.कश्मीरी इतिहासकार पृथ्वीनाथ कौल बमजई के मुताबिक़ अफगान शासन में घाटी गुलामी और गरीबी के चरम पर थी और क्योंकि इनका तरीका मुगलों से एकदम अलग था.वाल्टर आर. लारेंस ने लिखा है की पठान शासकों के लिए सर कलम करना फूल तोड़ने जैसा था,यातना के इनके तरीके इतने भयावह थे की नादिरशाह भी उनके आगे कुछ नहीं था.असद खान के शासन के समय मनोरंजन के रूप में कभी कभी घास के गट्ठर के दोनों तरफ एक एक कश्मीरी पंडित को बाँध कर डल झील में डूबने के लिए छोड़ दिया जाता था.मीर हज़र के समय घास के गट्ठर की जगह चमड़े के थैले ने ले ली थी और झील का एक हिस्सा पंडितों की कब्रगाह ही कहा जाता था लेकिन इस खेल में शियाओं को भी डुबाया जाने लगा था.लेकिन अब्दुल्ला खान इश्कअक्साई के शासन पर अफगानी क्रूरता चरम पर पहुँच गयी जब शिया, सुन्नी या पंडित का कोई भी भेद नहीं था और स्थानीय सभी लोगों के लिए क्रूरता और उनके साथ लूट समभाव से होने लगी.यह इतिहास का स्याह पन्ना है जिसे कोई याद नहीं रखना चाहेगा पर पढ़ने लगेंगे तो संवेदनशील लोगों के लिए भूलना भी मुश्किल ही है.

हमें तो बस यह याद रखना है की जब विभाजन के तुरंत बाद कबाइलियों के साथ और उनके रूप में पाकिस्तानी फौजी घाटी में घुसे थे तो पख्तूनों ने उनका तनिक भी साथ नहीं दिया और उन्हें खदेड़ने और पकड़ने में भारतीय फौज की मदद ही की थी,आज तक वो कश्मीर और हिन्दुस्तान के साथ ही हैं.हम क्यों न बादशाह खान की तरफ देखें और इस बात की तारीफ करें की अपनी मूल भूमि से बहुत दूर,भारत में भी अपनी संस्कृति को बचाए हुए,भारतीय हो चुके हैं कश्मीर के पख्तून.फिलहाल उनकी तरह हम भी आशा करें की कबूल से लेकर कश्मीर तक शांति हो जाए,और इनके लिए भी अपने पुरखों की जमीन तक आना जाना सहज बन जाए क्योंकि युसुफजई, अचकजई,अफरीदी,दुर्रानी केवल अफगानिस्तान में ही नहीं वरन हमारे कश्मीर में भी बसते हैं और उनके घरों से भी आती हैं आवाजें पश्तो संगीत की.यहाँ तक की दूरदर्शन कश्मीर से भी पश्तो में कार्यक्रम आने लगे हैं. महान अफगानी शासक शेर शाह सूरी को कौन भूल सकता है भला,काबुली वाले हमारे आपके मोहल्लों-गावों में कभी हींग,अखरोट-बादाम बेचने आते थे,अब यह सब कुछ बचे हुए बड़े बूढ़ों के किस्से में ही होगा लेकिन आज भी उनसे मिलना हो तो अपने मुल्क में ही इनके गाँव हो आइये.बाकी हाल ही में एक सेलिब्रेटी पख्तून अदनान सामी को भी भारत की नागरिकता मिली ही है.